Monday, March 5, 2012

अमीर की गरीबी और गरीब की अमीरी


बड़े दिनों के बाद देश में जनांदोलनों की आवाज सुनाई पड़ रही है। एक की बागडोर अन्ना के पास है, तो दूसरे पर दावा रामदेव कर रहे हैं। दोनों ही अलग तरह के शख्स हैं। अन्ना स्वभाव से फकीर। रालेगण सिद्धि गांव के एक मंदिर के छोटे-से कमरे में रहते हैं। अपनी कोई संपत्ति नहीं। उन्होंने गांधीवादी तरीके से गांव की काया ही बदल दी। बिना धनशक्ति के। यह गांव आज महाराष्ट्र में आदर्श गांव कहा जाता है। वहीं बाबा रामदेव गरीब परिवार में पैदा हुए। अन्ना की तरह ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। बचपन में ही संन्यास ले लिया और योगी बन गए। भगवा धारण कर लिया। स्वामी रामदेव के पहले तक योग एक पुरातनपंथी परंपरा थी। बाबा ने योग को आधुनिक भारत के लिए फैशनेबल कर दिया। रोज सुबह पार्क में लोग योग करने लगे। लेकिन बाबा खुद संन्यासी होने के बावजूद फकीर नहीं रह पाए। वह अरबपति बन गए। बाबा ने कारोबार शुरू किया और जमकर पैसा कमाया।
टीवी ने बाबा को 'लार्जर-दैन-लाइफ' बना दिया। खाकपति हो या अरबपति, नेता हो या अभिनेता, देसी हो या विदेशी उनके चेलों की जमात बढ़ने लगी। वह प्राइवेट जेट पर चलने लगे, प्राइवेट आइलैंड उनको गिफ्ट किए जाने लगे। समलैंगिकता हो या फिर कन्या भ्रूण-हत्या, बाबा रामदेव हर मसले पर अपनी राय देने लगे। देखते-देखते बाबा छा गए। उनसे मिलने के लिए और उनके योग शिविरो में शामिल होने के लिए लाखों की फीस वसूली जाने लगी। रामदेव ने एक पुरानी भारतीय परंपरा को पूरी तरह से पूंजीवाद के आवरण में प्रोडक्ट बना दिया, योग का कॉरपोरेटाइजेशन कर दिया। योग की मार्केटिंग के साथ-साथ बाबा भी एक ब्रांड बन गए। उनके नाम पर पैसे की बरसात होने लगी और उनके नाम का सिक्का सरपट भागने लगा। बाबा बिना किसी सरकार के सरकार बन गए। उनके सहयोगी और अनुयायी कहने लगे कि बाबा किसी भी राजनेता और प्रधानमंत्री से ज्यादा पावरफुल हो गए हैं।
 पावर किसी को भी नहीं बख्शती। बाबा भी महत्वाकांक्षी हो गए। मैं कई बार उनसे मिला। हर बार मुझे उनमें बदलाव नजर आया। वह हमेशा उदार, मृदुभाषी रहे, लेकिन उनके पीछे हमेशा एक नई शख्सीयत मुझे दिखती रही। पहली बार तब चौंका, जब उन्होंने कहा कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था से परेशान हैं और उसे बदलना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वह अपनी एक पार्टी बनाएंगे। उनका अपना मैनिफेस्टो होगा, जिसे उन्होंने जारी भी किया था। यह भी कहा कि वह अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे। हालांकि उन्होंने मुझे एक इंटरव्यू में कहा था कि वह कभी भी कोई पद नही लेंगे और न ही चुनाव लडेंगे। न जाने क्यों मुझे वीपी सिंह की वह लाइन याद रही थी कि शेर की सवारी तो आसान है, लेकिन उससे उतरना बहुत मुश्किल। मैंने उनसे प्रतिवाद किया कि भारत की परंपरा में ऋषियों ने कभी भी राजनीतिक सत्ता को अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं की, चाहे वह वशिष्ठ मुनि हों या फिर विश्वामित्र। सभी समाज में रहते हुए भी समाज से अलग ही रहे। राजनीति में उनकी भूमिका सिर्फ सलाहकार की रही। राजा ने सलाह मांगी, तो दे दी। राजाओं ने भी उनका सम्मान किया। संन्यासियों के चरणों मे बैठकर शिक्षा ली, ज्ञान का आशीर्वाद ग्रहण किया, लेकिन किसी भी मुनि को राजसत्ता नहीं सौंपी।
भारतीय परंपरा में धर्म और राजनीति हमेशा से अलग रहे। दोनों का अलग स्थान रहा। दोनों ने एक दूसरे का सम्मान किया, लेकिन एक दूसरे की भूमिका को अपनाने की कोशिश नहीं हुई। इसलिए भारतीय परंपरा में दोनों के बीच टकराव के उदाहरण विरले ही मिलते हैं। बाबा रामदेव के राजनीतिक एजेंडे को सुनकर मुझे लगा कि बाबा समाज से अर्जित अपनी भूमिका को पलटने के मूड में हैं। वह राजनीति में धर्म का घालमेल करना चाहते हैं और भारतीय परंपरा को नए सिरे से लिखना चाहते हैं। उनसे तर्क किया, लेकिन वह बेकार था। फिर कुछ संगठनों और राजनीति के पुराने घाघ लोगों से उनकी मुलाकात की खबरें आने लगीं। मेरी आशंका सच होने लगी। फिर सुना कि वह दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन करना चाहते हैं। और इसकी तैयारी में वह देश के कोने-कोने में घूम रहे हैं। वह दिन भी आ गया, जब वाकई बाबा रामदेव धरने पर बैठ गए। सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री प्रणब मुखर्जी के मनाने के बाद भी। कुछ अटपटा लगा। लेकिन उनके पहले अन्ना हजारे का अनशन देखा था। उसकी अभूतपूर्व सफलता से प्रभावित भी था। सो कुछ नहीं बोला। लगा भारतीय राजनीति और समाज में कुछ ऐसे बुनियादी बदलाव हो रहे हैं, जो मैं नहीं देख पा रहा हूं।
बाबा के अनशन में 40-50 हजार आदमी भी जुट गए। यह बाबा की क्षणिक सफलता थी। उनके यहां जुटी भीड़ का स्वरूप सामने आने लगा। रामलीला मैदान का अनशन लोगों में वह उत्साह नहीं पैदा कर पाया, जो अन्ना के जंतर-मंतर ने किया था। बाबा रामदेव के यहां भीड़ जरूर थी, लेकिन ये वो लोग थे, जो बाबा के भक्त थे। रामलीला मैदान एक योग शिविर था। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कटिबद्ध लोगों का हुजूम नहीं। स्थानीय लोग नदारद। दिल्ली के बाहर भी लोगों में उत्तेजना और उत्साह गायब था। मुझे समझ में आने लगा कि धार्मिक और योगी होने के बाद भी बाबा वो चमत्कार नहीं कर पाए, जो अन्ना की सादगी ने कर दिया। बाबा की ताकत में पैसे का जोर दिखा, संगठन की ताकत दिखी। पैसा और संगठन ही अगर किसी देश में ज्वार पैदा कर पाते, तो आज तक कई अरबपति देश की सत्ता पर आसीन हो गए होते, और संगठन ही अगर ताकत होती, तो आरएसएस कब का देश पर कब्जा कर चुका होता।
साफ है, बाबा रामदेव की आध्यात्मिकता में वह नैतिक आभा नहीं दिखी, जो अन्ना हजारे के फक्कड़पन में लोगों को नजर आई। अन्ना जैसे फकीर में लोगों को नए युग का नया गांधी दिखा और बाबा में एक व्यवसायी। हिन्दुस्तान के लोग समझदार हैं। वो पहले से ही राजनीति के व्यवसायीकरण से त्रस्त हैं। वो फिर किसी दूसरे व्यवसायी के मोहपाश मे क्यों फंसते? इसलिए बाबा रामदेव चार जून के अनशन और अरबों की संपत्ति के बाद भी आज ज्यादा गरीब दिखाई देते हैं और एक फकीर कहीं ज्यादा अमीर। गांधी का यह देश अब भी ज्यादा नहीं बदला है। नैतिकता की पूंजी अब भी उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। नैतिकता किसी स्वामी के भगवे चोले की जागीर नहीं है। नैतिकता चोला नहीं, आत्मा देखती है। और आत्मा की आवाज सुनाई नहीं पड़ती वह सिर्फ महसूस होती है
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